शंकर लाल पुरोहित का एक छोटा सा परिवार था,पति पत्नी और एक 4 साल का बच्चा। ये सब हंसी-खुशी जीवन बिता रहे थे। शंकर लाल जी का नित्य का नियम मंदिर जाने का था। एक दिन उन्होंने अपने बच्चे को कहा - ले भाई आज तू भी चल । बच्चा भी उस दिन साथ में मंदिर चला गया।वहां जाकर उसको अजीब सा सुकून महसूस हुआ। जब वह शिव जी की मूर्ति के सामने जाकर खड़ा हुआ तो उसे लगा जैसे कोई आकर्षण है जो उसे अपनी ओर खींच रहा है । उसके मन में ईश्वर के प्रति कृतज्ञता उत्पन्न हुई और वह एकटक शिव जी की मूर्ति को नि हारता रहा। पास ही एक बड़ा सा शिवलिंग स्थापित था , वहां जाकर उसने शिवलिंग को सिर झुका कर भक्ति भाव का प्रदर्शन किया ।उसने अपने पिता को बताया कि मुझे यहां मुझे अजीब सी अनुभूति हुई है। मुझे लगता है कि इस दुनिया को चलाने वाली शक्ति यही है, मुझे नित्य इन्हें प्रणाम करना है। बेटे की बात से शंकर लाल जी बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने अपने मकान के बाहर ही खुली जगह पर शिवलिंग की स्थापना कर दी। अब वह छोटा बच्चा पुरोहित की भांति वेश धारण करता और जाकर शिवलिंग पर पूजा अर्चना करता। उसका यह भक्ति भाव देख माता-पिता बड़े प्रसन्न हुए और धीरे-धीरे परिवार के खुशियों में दिनों दिन बढ़ोत्तरी होती चली गई। इस बच्चे के हृदय में ईश्वर का वास हो चुका था।
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