न बिंदु न अल्प न पूर्ण विराम,
न थी सरल,वह तो थी वक्र रेखा।
चांद भी फीका पड़ जाए,
ऐसा रूप है मैंने देखा।
सिर पर बालों की काली घटा,
चेहरे पर ना था एक भी 'पिंपल'।
मुस्कराई थी जब वह एक पल को,
गोरे गालों पर पड़ गए थे 'डिंपल'।
हाथों में चूड़ियां और कंगन,
कानों में लटकती सुनहरी बालियां।
सुराही जैसी गर्दन तो यूं लगी,
जैसे फूलों से लदी हो डालियां।
गर्दन जो घुमाई इधर उसने,
तो जैसे बादलों से चांद निकला।
संभाला हुआ था जिस दिल को हमने,
यूं लगा कि अब फिसला अब फिसला।
ललाट पर लटकती जुल्फें,
चोटी तो छू रही थी उसकी कमर।
इधर-उधर तो कहां देखते हम,
उस पर ही टिक गई थी हमारी नजर।
आंखों में समाया हो जैसे पूरा ही समंदर,
सीप और मोती बिखरे पड़े हों उसके अंदर।
कितने ही दिलों में मचा दे जो हलचल,
कितने ही बन जाएं देखकर मस्त कलंदर।
पलकें जो उठे तो सुबह हो,
और जो झुके तो शाम हो ।
दिल हमारा आ गया सब्जपरी पर,
अब चाहे य़ह बात आम हो।
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