सुनो ओ जाने जां,रूह में तुम बसने लगे हो,
नींद न आए रात भर,भोर के सपने लगे हो।
दुनिया नहीं किसी की, बस पराई है,
एक तुम ही हो जो अपने लगे हो।
नहीं कहा किसी ने प्यार करना गुनाह है,
फिर क्यों जमाने से डरने लगे हो।
खुलकर आओ दिल में समाओ,
क्यों बर्फ की मानिंद जमने लगे हो।
कुछ हो गई हो हमसे खता तो शिकायत करो ना
क्यों सर्प बन डसने लगे हो।
प्यार में कंजूसी तो कतई बर्दाश्त नहीं,
ऐसा लगे कि मेघ की भांति बरसने लगे हो।
प्रेम संदेसा पाकर पक्षी बन उड़ने लगी थी
क्यों तुम मेरे पंख कतरने लगे हो।
पहले तो आंखें झुका शर्माने लगते थे,
अब क्यों गुस्ताखियां करने लगे हो।
स्वरचित एवं मौलिक
सतीश गुप्ता पोरवाल
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