हर राह तुम्हारी इधर ही मुड़ती रही,
प्रेम की कड़ी से कड़ी जुड़ती रही।
राहें थी अनेक तुम इधर न उधर गए,
सच तो यह है कि तुम रूह से रूह में उतर गए।
खयाल तुम्हारा रात भर आता रहा,
नींद न आई सपने ही दिखाता रहा।
तुम इतने बेमुरव्वत कैसे हो गए,
बादलों में छिपते हुए चांद जैसे हो गए।
साथ थे तो रुत सुहानी आई थी,
मेरे सूने से दिल में बहार आई थी।
दिल तो जैसे सावन के झूले में झूल रहा था,
मन जैसे सारे दुख-दर्द भूल रहा था।
मैं कब से तुम्हारी राह निहार रही हूं,
बन रही हूं पतझड़ पहले बहार रही हूं।
न मालूम तुम किस गली गांव शहर गए ,
मानो न मानो तुम रूह से रूह में उतर गए।
स्वरचित-सतीश गुप्ता पोरवाल
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