मानव जीवन शून्य से ही शुरु होता है,
शून्य से पहले अधर में ही होता है।
कोई बताये इस स्तिथि के लिए क्या कहूं,
अब इसे आरंभ लिखूं या अंत लिखूं।
पत्तों से आच्छादित हरे हरे वृक्ष,
तज देते हैं एक समय पर अपने वस्त्र।
नव कोमल वस्त्रों का होता है इंतजार,
अब इसे पतझड़ कहूं या बसंत कहूं।
प्रकृति मानव की भिन्न भिन्न होती है,
सोच कभी कभी छिन्न भिन्न होती है।
अपनों को पराया,परायों को अपना करता है ,
अब मानव को दानव कहूं या संत कहूं।
जन्म के साथ ही मृत्यु निश्चित है,
जीवन मे जो करता है किंचित है।
जीवन के अंत में जहां चला जाता है,
उसे शून्य कहूं या अनंत कहूं।
स्वरचित
सतीश गुप्ता पोरवाल
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें