शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2023

जलधारा सा बहे जा रहे हैं-- कविता


छुपा कर रखी थीं जो बातें जमाने से,

वो सब अब कहे जा रहे हैं।

विपरीत दिशा में तो खूब चल लिये,

अब जलधारा सा बहे जा रहे हैं ।


दर्दे दिल सीने में छुपाये जा रहे थे ,

उनके ही ढर्रे में ढले जा रहे थे ।

उनकी ही परवाह करते रहे ज़िंदगी भर,

 जो हमारे प्रति बेपरवाह हुए जा रहे थे।


सब कुछ तो दे चुके थे हम उन्हें ,

अब क्या अपनी जिंदगी भी उन पर लुटा देते ।

जो भी राज़ था उनके मन में ,

काश एक बार तो हमको बता देते ।


अब रहे न नासमझ,समझ गए हम ,

कि हम गलत राह पर जा रहे हैं।

अब नहीं चल रहे हम विपरित दिशा में,

अब जलधारा सा बहे जा रहे हैं ।


स्वरचित-सतीश गुप्ता'पोरवाल"

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