छुपा कर रखी थीं जो बातें जमाने से,
वो सब अब कहे जा रहे हैं।
विपरीत दिशा में तो खूब चल लिये,
अब जलधारा सा बहे जा रहे हैं ।
दर्दे दिल सीने में छुपाये जा रहे थे ,
उनके ही ढर्रे में ढले जा रहे थे ।
उनकी ही परवाह करते रहे ज़िंदगी भर,
जो हमारे प्रति बेपरवाह हुए जा रहे थे।
सब कुछ तो दे चुके थे हम उन्हें ,
अब क्या अपनी जिंदगी भी उन पर लुटा देते ।
जो भी राज़ था उनके मन में ,
काश एक बार तो हमको बता देते ।
अब रहे न नासमझ,समझ गए हम ,
कि हम गलत राह पर जा रहे हैं।
अब नहीं चल रहे हम विपरित दिशा में,
अब जलधारा सा बहे जा रहे हैं ।
स्वरचित-सतीश गुप्ता'पोरवाल"
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