* इंसान बनूं या फिर- - -
खड़ा हूं समय के दोराहे पर ,
क्या करूं,जाऊं तो किधर जाऊं।
उलझा रही है यह फरेबी दुनिया,
तुम ही कहो जीऊं या मर जाऊं।
वादे किए थे मैंने भी कुछ वैसे,
निभाऊं या फिर मुकर जाऊं।
यह दुनिया चाहती है, वैसा ही,
इंसान रहूं या फिर सुधर जाऊं।
सतीश गुप्ता 'पोरवाल',
मानसरोवर,जयपुर।
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