हो तुम्हारा साथ तो सुगम हो जीवन यात्रा,
सुखों का हो अम्बार, दुखों की कम हो मात्रा।
भटकता है मन मेरा मायावी संसार में,
उलझ गया हूं मैं दुनियां के बाज़ार में।
अपने सभी अवगुणों को छोड़ दूं,
साथ में सभी गुणों को जोड़ दूं।
नित ही नये- नये विचारों का सृजन करुं,
क्या सही और क्या ग़लत पर मनन करुं।
न करुं मैं किसी से भी कोई भेदभाव,
रखूं मन में, सभी के लिए समभाव।
अकेला तो कैसे मैं अवरोधों से टकराऊंगा,
ऐसे कैसे भवसागर को पार कर पाऊंगा।
अब तो बस रम जाऊं तुम्हारी भक्ति में,
ताकि संभावित वृद्धि हो मेरी शक्ति में।
असंभव सा नजर आता है पाना किनारा,
संभव तो तभी हो जब साथ हो तुम्हारा।
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