शनिवार, 14 मार्च 2026

नारी तू नारायणी - कविता

 *नारी तू नारायणी*

  नारी तू नारायणी,तू ही जग की जीवन दायिनी,

तपती हुई ग्रीष्म में भी,शीतलता देती हुई चांदनी।

 

सृष्टि की उत्पत्ति से ही देवताओं संग देवियां हुईं,

आज वही कोई मां, कोई बहिन, कोई बेटियां हुईं।


 देवी के दर्शाये जाते हैं दो से ज्यादा हाथ,

 क्योंकि कई-कई उत्तरदायित्व निभाती हैं एक साथ।


सौम्यता,सोहार्द, मधुरता की स्वामिनी होती हैं नारियां,

फिर भी कठिन से कठिन निभाती हैं जिम्मेदारियां।

 

घर में जब आती बेटी,बन जाती आंगन की फुलवारी, 

घर में लाती खुशहाली, बनती सबकी ही प्यारी। 


एक समय वह आता जब उसे ब्याहा जाता है,

 बेटी द्वारा पर द्वारे बाग सजाया जाता है।


जल,थल या नभ हो, हर जगह कदम बढ़ाया है, 

कदम जहां भी बढ़ाया,वहीं नाम कमाया है।


हे नारी- तू हर काल में,हर हाल में वंदनीय है, 

 ईश्वर ही नहीं तू भी मन मंदिर में पूजनीय है।


स्वरचित एवं मौलिक-

‌सतीश गुप्ता पोरवाल,मानसरोवर, जयपुर

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