बुधवार, 8 अप्रैल 2026

मौसम सी फितरत -- गीत

 अपनी बात पर अडिग रहना नहीं सीखा तुमने, 

मौसम की तरह बदल जाना तुम्हारी फितरत क्यों है।


तुम्हारी बातों के जाल से घिर गया था मैं,

तुम्हारे हुस्न के जलवे से घिर गया था मैं।

क्या बताऊं आखिर मुझे तुम्हारी जरूरत क्यों है,

मौसम की तरह बदल जाना तुम्हारी फितरत क्यों है। 


जिसने भी तराशा तुझे क्या खूब रहा होगा,

फूलों की सुंदर वादियों में घूम रहा होगा। 

 पत्थर की नहीं तू संगमरमर की मूरत क्यों है,  

मौसम की तरह बदल जाना तेरी फितरत क्यों है।


सुंदरता का तो में पुजारी हरगिज नहीं,

इधर-उधर भटकता रहे ऐसा मेरा दिल नहीं। 

मेरे दिल में समा गई तू ऐसी मूरत क्यों है,

 मौसम की तरह बदल जाना तेरी फितरत क्यों है।


Mssa

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